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Shri Bhakt Maal (Gita Press, Gorakhpur)/ ShriBhaktMaal / Shri BhaktMaal / Shri BhaktMal / ShriBhaktMal Hardcover

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About the Author
गीताप्रेस, गोरखपुर का संक्षिप्त परिचय गीताप्रेस की स्थापना परतंत्र भारत में वि०सं० १९८० (सन् 1923) में हुई थी। यदि हम उस समय की सामाजिक परिस्थितियों की तरफ दृष्टि डालें तो पता चलता है कि सदियों से देश पर मुगल आक्रान्ताओं और विधर्मियों का शासन था, जिनका एकमात्र उद्देश्य हमारी संस्कृति और सभ्यता को नष्ट करना, हमारे उपासना- स्थलों को तोड़ना, हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित करना, हमारी पूजा-पद्धतियों को ढोंग बताना, हमारे धर्मगुरुओं को अपमानित करना तथा हमारे धर्म-ग्रन्थों को जलाना था। सनातन धर्म पर संकट मँडराने लगा था। भयवश हिन्दू विरोध करने से कतराते थे। हमारे धर्म-ग्रन्थ लुप्तप्राय हो चुके थे। पूजा-उपासना के लिये हमारे देवी-देवताओं के प्रामाणिक चित्र तक उपलब्ध नहीं हो पा रहे थे। ऐसी परिस्थिति में सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार की बड़ी आवश्यकता महसूस होने लगी थी। भारतीय जन-मानस में ऐसी धारणा बना दी गयी थी कि गीता पढ़नेवाला व्यक्ति संन्यासी हो जाता है, अथवा गीता संन्यासियों के पढ़ने का ग्रन्थ है। इस धारणा से बाहर निकलने, गीता-प्रचार एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों के प्रचार-प्रसार के लिये ही गीताप्रेस की स्थापना हुई। उस समय गीता पर आचार्यों की टीकाएँ प्रायः संस्कृत में ही उपलब्ध थीं, जो सामान्य पढ़े-लिखे लोगों की समझ के बाहर थी। अन्वय, पदच्छेद के साथ प्रत्येक शब्द के अर्थ जानने की रुचि पाठकों में थी, पर कोई अच्छी टीका हिन्दी में उपलब्ध नहीं थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये गीताप्रेस के संस्थापक परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन जयदयाल गोयन्दका जी ने गीता जी की पदच्छेद, अन्वय के साथ सर्वजनोपयोगी टीका हिन्दी में तैयार की। इस तरह देखा जाय तो श्रीमद्भगवद्गीता का प्रकाशन एवं प्रचार ही गीताप्रेस की स्थापना की मूल प्रेरणा है। गीताप्रेस का मुख्य उद्देश्य ईश्वरप्रेम, सत्य, सदाचार और सद्भावों के प्रचार-हेतु मानव-सेवार्थ सद्ग्रन्थों आदि का प्रकाशन करना है। गीताप्रेस का मुख्य कार्य सस्ते-से-सस्ते मूल्य पर सत्साहित्य का प्रचार और प्रसार करना है। पुस्तकों के मूल्य प्रायः लागत से कम रखे जाते हैं, परन्तु इसके लिये यह संस्था किसीसे किसी प्रकार का आर्थिक सहयोग स्वीकार नहीं करती। परम श्रद्धेय श्रीजयदयाल जी गोयन्दका के मन में यह भाव बड़ा प्रबल था कि हमलोगों को गृहस्थाश्रम में ही सुख-शान्ति कैसे मिले तथा हमें भगवत्प्राप्ति हो सके। उनके एक ही लगन थी कि मानवमात्र इस भवसागर से कैसे पार हो? साधक भाई-बहनों की एक धारणा बन गयी थी कि भगवत्प्राप्ति करने के लिये एकान्त में जाना, तीर्थस्थान में जाना, वन में जाना आवश्यक है। वहाँ जाकर कठोर परिश्रम, साधन-तपस्या करके ही भगवत्प्राप्ति सम्भव है। कई ऐसे प्रचलित भ्रम फैले हुए थे कि स्त्री, शूद्र, वैश्य एवं गृहस्थों का कल्याण नहीं होता। माताएँ-बहनें पति की सेवा से, व्यापारी शुद्ध व्यापार से, पुत्र पिता की सेवा से, शिष्य गुरु की सेवा से, गृहस्थ अतिथि-सेवा से भगवत्प्राप्ति कर सकते हैं। इन्हीं भावों के प्रचार तथा भगवद्गीता के प्रचार के द्वारा मानवमात्र के कल्याण के उद्देश्य से उन्होंने गीताप्रेस, गीताभवन, श्रीऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम की स्थापना की। प्रमुख कार्य-सत्-साहित्य का प्रकाशन श्रीमद्भगवद्गीता के साथ-साथ रामायण, पुराण, उपनिषद्, भक्त-चरित्र, नित्यपाठ, साधन-भजन एवं बालोपयोगी पाठ्य-पुस्तकें, स्त्रियोपयोगी, सर्वोपयोगी पुस्तकें, चित्रकथा इत्यादि प्रकाशित किये जाते हैं। श्री जयदयाल जी गोयन्दका (सेठजी), श्री हनुमानप्रसाद जी पोद्दार (भाईजी), स्वामी श्री रामसुखदास जी के प्रवचनों को पुस्तक-रूप में प्रकाशित किया गया है। दिन-प्रतिदिन भगवत्कृपा से प्रकाशनों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। अहिन्दीभाषी लोगों की सुविधा तथा माँग पर हिन्दी, संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी, बँगला, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, ओड़िआ, असमिया, मलयालम, पंजाबी, नेपाली, उर्दू भाषाओं में भी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वर्तमान में गीताप्रेस के लगभग १,८०० से अधिक प्रकाशन हैं।

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Description

Books
ISBN: 9789369943449
Product Code: EKA-0409203073
Publisher: GITA PRESS GORAKHPUR; 2022nd edition
Format: Printed Book
Language: Hindi
Reading Age: 15 years to Above
Publication Date: July 06, 2022
Binding: Hardcover
Quantity: 1 Book
Weight: 1 Kg
HSN Code: 49011010
Origin: India
Pages: 848
Author: GITA PRESS GORAKHPUR
Dimensions: 20 x 25 x 5 cm

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